मिलने और फु रसत के नाम
सं
डे क ा मतलब ही होता है छु ट्ट ी। वो दिन
जिस दिन सभी क ामों से छु टक ारा पाक र
आराम क रने क ा पूर ा मौक ा मिलता है ।
इस दिन क ा खास इं तजार होता है योंकि इस
दिन क हीं आना जाना नहीं होता। मतलब कि पूर ा
दिन घर पर गुजारने क ी पूर ी आजादी। इसी दिन
घरवालों और मित्रों के साथ मिल बैठ ने मौक ा
मिलता है । भागदौड़ भरी जिंदगी से अवक ाश।
बचपन में जब स्कू ल जाया क रते थे तब संडे क ा
दिन के वल धमाचौक ड़ी, मौज मस्ती और खेल
कू द में ही निक ल जाया क रता था। उस दिन
स्क ूल जाने और पढ़ ने लिखने क ी बंदिश नहीं
होती थी। क ॉलेज में भी क मोबेश यही स्थिति
थी। जब क ाम क रना शुरू कि या तो थोड़ी स्थिति
बदल गई ।
आज जब पुर ाने दिनों से तुलना क रता हूं तो
मेरे लिए संडे क ा स्वरू प बदल गया है योंकि
ना तो अब दफ्तर जाना पड़ता है और ना ही क ाम ■ अशोक वाजपेयी, क वि
खत्म क रने क ी बंदिश होती है । पढ़ ाई के बाद
जब मैं क ाम क रने लगा तो सप्ताह के छह दिनों में दफ्तर में क ाम क रना होता था और लिखने
क ा समय ही नहीं मिल पाता था। इसलिए इस दिन मैं केे वल लिखने क ा क ाम क रता था पर
अब वो समय और वो बात नहीं रही। अब लिखने क ा पर्याप्त समय होता है इसलिए संडे
के दिन मैं के वल पढ़ ने क ा और प्रियजनों के साथ समय बिताने क ा क ाम क रता हूं । अब तो
संडे क ी शुरू आत ही अखबार पढ़ ने के साथ होती है । मेर े दो तीन घंटे तो अखबार पढ़ ने में
ही निक ल जाते हैं । हम लोगों क ा तो क ाम ही है पढ़ ने और लिखने क ा है , पढ़ ने लिखने के
शौक के क ारण मेरे लिए सबसे बेह तरीन संड े शायद वो होगा जब मेरे पास पढ़ ने क ा पर्याप्त
अवक ाश हो और मैं मल्लिक ार्जुन मंसूर और कु मार गंधर्व के संगीत क ो सुनते हु ए निर्बाध
पढ़ ता ही रहूं ।
विदेशों में संडे के दिन सब कु छ बंद होता है इसलिए वहां सब कु छ सूना सूना लगता है ।
थोड़ा अटपटा लगता है कि वहां इस दिन कु छ भी खुला नहीं मिलता। इस दिन वहां आप
कि सी से मिल भी नहीं सक ते। हमारे देश में तो हम अपनी व्यस्तताओं के बीच कि सी से
मिल ही संडे क ो सक ते हैं । पिछले संडे क ो मैंने पालो नेरू दा क ी प्रेमिक ा, जो बाद में उनक ी
पत्नी भी बनी, क ी आत्मक था पढ़ ी। इसे पढ़ ते हु ए क ाफ ी समय गुजर गया। शाम क ो अपने
दोस्तों के साथ इधर-उधर क ी बातें और हं सी-मजाक में समय गुजारा।
अर्पिता शर्मा से बातचीत पर आधारित
मेरा संडे
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